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भाषीय ग्रंथसूची  

  

राष्‍ट्रीय ग्रंथसूची के लिए रोमन लिपि को स्‍वीकार करना एक कठिन निर्णय था, चूँकी 14 भाषाओं को एक साथ और एक क्रम में मिलाने के लिए कोई और दूसरा उपाय नहीं था । किंतु ऐसा करने से यह सोचा गया और इसकी आलोचना भी हुई कि राष्‍ट्रीय ग्रंथसूची का उद्येश्‍य पश्‍चिम का सेवा करना है । इसलिए यह तय किया गया

कि राष्‍ट्रीय ग्रंथसूची को उसके प्रत्‍येक क्षेत्रीय भाषाओं को भाषीय फसीकल कि सहायता से संबंधित राज्‍य सरकार से प्रकाशित किया जाए । यह व्‍यवस्‍था 70 के दशक तक सुचारू रूप से चला । इसके बाद कई राज्‍य सरकार के संस्‍थाऍं सहयोग देना बंद कर दिए । परंतु आज भी केरला की सरकार और उत्‍तर प्रदेश की सरकार सक्रिय रूप से मलयालम, हिंदी और उर्दू ग्रंथसूची के प्रकाशन हेतु केंद्रीय संदर्भ पुस्‍तकालय, कोलकाता को सक्रिय सहयोग दे रहा है । कुछ भाषीय ग्रंथसूची जैसे तमिल, बंगला और आसामी को केंद्रीय सदर्भ पुस्‍तकालय खुद प्रकाशन कर रहा है |

 

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